DDA Ground Narela Chhathh Pooja : नरेला छठ पूजा शुरू

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  • Anil Attri
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  • डा गिरिराजशरण अग्रवाल
  • 1
    मुझे जिसकी इक-इक गली जानती है
    वो बस्ती मुझे अजनबी जानती है
    कला हम भी पुश्ते बनाने की सीखें
    जमीं काटना गर नदी जानती है
    गिरी ओस लेकिन न अधरों से फूटी
    कली कैसी जालिम हँसी जानती है
    अँधेरे हों, कोहरा हो, बन हो, भँवर हो
    बिताना समय जिदगी जानती है
    लपट-सी उठी और नजरों से ग़ायब
    अँधेरा है क्या रोशनी जानती है

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    मधुरता में तीखा नमक है तो क्यों है
    किसी का भी जीवन नरक है तो क्यों है
    कसक में तड़पने से कुछ भी न होगा
    यह सोचो कि दिल में कसक है तो क्यों है
    अकेले हो, इसका गिला क्या, यह सोचो
    किसी से मिलन की झिझक है तो क्यों है
    जरा-सा है जुगनू तुम्हारे मुकाबिल
    मगर उसमें इतनी चमक है तो क्यों है
    लचकती है आँधी में, कटती नहीं है
    हरी शाख़ में यह लचक है तो क्यों है
    वो हो लालिमा, चाँद या फूल कोई
    सभी में तुम्हारी झलक है तो क्यों है

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    आँखों में स्वप्न, ध्यान में चहरे छिपे हुए
    बेरंगियों में रंग हैं कितने छिपे हुए
    कोई नहीं कि जिसमें न हो जिदगी की आग
    पत्थर में हमने देखे पतंगे छिपे हुए
    पाया निराश आँखों में अंकुर उमीद का
    रातों में हमने देखे सवेरे छिपे हुए
    कुछ देर थी तो खोजते रहने की देर थी
    बीहड़ वनों के बीच थे रस्ते छिपे हुए
    फैली जरा-सी धूप तो बाहर निकल पड़े
    पेड़ों की पत्तियों में थे साये छिपे हुए

    4
    अगर स्वप्न आँखों ने देखा न होता
    समझ लो कि मौसम यह बदला न होता
    जमीनों से उगतीं चिराग़ों की फ़सलें
    निराशा न होती, अँधेरा न होता
    कमर आदमीयत की ऐसे न झुकती
    समाजों से ऊपर जो पैसा न होता
    जमीं नफ़रतों के शरारे उगलती
    दिलों में जो चाहत का दरिया न होता
    जरा सोचिए हम गिला किससे करते
    जमाने में गर कोई अपना न होता

    5
    चलते रहो मंजिल की दिशाओं के भरोसे
    जलते हुए दीपों की शिखाओं के भरोसे
    पतवार को हाथों में सँभाले रहो माँझी
    छोड़ो नहीं किश्ती को हवाओं के भरोसे
    सच यह है कि दरकार है रोगी को दवा भी
    बनता है कहाँ काम, दुआओं के भरोसे
    सूखा ही गुजर जाए न बरसात का मौसम
    तुम खेत को छोड़ो न घटाओं के भरोसे
    ख़ुद अपना भरोसा अभी करना नहीं सीखा
    जीते हैं अभी लोग ख़ुदाओं के भरोसे

    डा. गिरिराजशरण अग्रवाल
    7838090732  
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    26 से 29 अक्तूबर तक आई आई टी कानपुर में जोश और उत्साह की अंतराग्नि....

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  • ravindra prabhat
  • अंतराग्नि आईआईटी कानपुर का वार्षिक सांस्कृतिक महोत्सव है। यह अपने प्रकार के कार्यक्रमों में संपूर्ण एशिया में सबसे उत्कृष्ट महोत्सवों की श्रेणी में आता है। अंतराग्नि ने विगत वर्षों में अपनी एक अलग पहचान कायम की है, और अपने 52 वें संस्करण में, इसकी भव्यता पहले से कहीं अधिक बड़ी और बेहतर होने जा रही है। सर्वाधिक उत्सुकता उत्पन्न करने वाले इस महोत्सव का विशाल स्तर पर आयोजन सभी में जोश और उत्साह के संचार का स्रोत है। हर वर्ष अंतराग्नि में 300 से अधिक महाविद्यालयों से लगभग 20000 प्रतिभागी शामिल होते है, जो अपने आप में इस महोत्सव की भव्यता को दर्शाता है। इस बार अंतराग्नि17 का आयोजन 26 से 29 अक्तूबर तक आई आई टी कानपुर में संपन्न होगा।
    यदि आप डांस, सिंगिंग, ड्रामा, मॉडलिंग, फोटोग्राफी, क्विज आदि में रूचि रखते हैं, तो आईआईटी कानपुर में होने वाला "अंतराग्नि 2017" महोत्सव आपके लिए एक सुनहरा अवसर है। 26 से 29 अक्तूबर तक चलाने वाले इस महोत्सव में कुल 14 प्रतियोगिताएं होंगी और कुल 28 लाख के नगद इनाम प्रदान किए जाएँगे। इसमें किसी भी डिग्री कॉलेज के छात्र हिस्सा ले सकते हैं। इसके लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया शुरू है और इसकी अंतिम तिथि 2 अक्तूबर निर्धारित है, जो अंतराग्नि के आधिकारिक वेबसाईट www.antaragni.in  पर किए जा सकते हैं। 
    जैसा कि प्रत्येक वर्ष होने वाले इस महोत्सव में देश दुनिया के हजारों छात्र-छात्राएं हिस्सा लेते हैं। वोलीवूड और अंतर्राष्ट्रीय कलाकार इसमें हिस्सा लेते हैं। यह अपने आप में अत्यंत अनूठा इवेंट है। डांस, सिंगिंग, ड्रामा, मॉडलिंग, फोटोग्राफी, क्विज, फाइन आर्ट्स, ड्रामाटिक्स, फिल्म एवं फोटोग्राफी आदि के अलावा इस इवेंटस में इंगलिश और हिन्दी साहित्य को भी शामिल किया गया है। इंगलिश लिट्रेचर के अंतर्गत पोएटरी स्लेम, जैम, क्रिएटिव राइटिंग, वर्ल्ड गेम्स और पार्लियामेंट्री डिबेटस होगी जबकि हिन्दी साहित्य के अंतर्गत किरदार, काव्यांजलि, दृष्टिकोण, आमने-सामने और शब्द रंग जैसी प्रतियोगिताएं होंगी। इन प्रतियोगिताओं के अंतर्गत डांस पर कुल पाँच लाख रूपये, म्यूजिकल पर ढाई लाख, क्विज पर एक लाख, फाइन आर्ट्स पर एक लाख, ड्रामाटिक्स पर तीन लाख, फिल्म और फोटोग्राफी पर ढाई लाख तथा इंगलिश लिट्रेचर और हिन्दी साहित्य पर डेढ़-डेढ़ लाख के इनाम वितरित किए जाएँगे।
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    मेरी न्यूजीलैंड यात्रा/रवीन्द्र प्रभात

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  • ravindra prabhat
  • संस्मरण

    नई दिल्ली (भारत), लखनऊ (भारत), काठमांडू (नेपाल), थिंपु (भूटान), कोलंबो (श्री लंका) और बैंकॉक (थाईलैंड) के बाद परिकल्पना, गोपियो और भारतीय विद्या भवन न्यूजीलैंड के द्वारा संयुक्त रूप से सातवाँ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन दिनांक 23 दिसंबर 2016 से 01 जनवरी 2017 के बीच प्रकृति की अनुपम छटा से ओतप्रोत प्रशान्त महासागर में ऑस्ट्रेलिया से सटे हुये दक्षिण पश्चिमी पेसिफिक ओशन के दो बडे द्वीप और अन्य कई छोटे द्वीपों से बने बेहद खूबसूरत देश न्यूजीलैंड की आर्थिक राजधानी ऑकलैंड, हेमिल्टन और रोटोरुआ में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर आयोजित सम्मान समारोह, आलेख वाचन, चर्चा-परिचर्चा में देश विदेश के अनेक साहित्यकार, चिट्ठाकार, पत्रकार, अध्यापक, संस्कृतिकर्मी, हिंदी प्रचारकों और समीक्षकों की उपस्थिति रही। जैसा कि आपको विदित है कि ब्लॉग, साहित्य, संस्कृति और भाषा के लिए प्रतिबद्ध संस्था ‘परिकल्पना‘ पिछले पाँच वर्षों से ऐसी युवा विभूतियों को सम्मानित करती आ रही है जो ब्लॉग लेखन को बढ़ावा देने के साथ-साथ कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। इसके अलावा वह सात अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलनों का संयोजन भी कर चुकी है जिसका पिछला आयोजन थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में किया गया था। 
    न्यूजीलैंड प्रशान्त महासागर में ऑस्ट्रेलिया से सटा हुआ दक्षिण पश्चिमी पेसिफिक ओशन में दो बडे द्वीप और अन्य कई छोटे द्वीपों से बना एक देश है। इसके 40 लाख लोगों में से लगभग तीस लाख लोग उत्तरी द्वीप में रहते हैं और दस लाख लोग दक्षिणी द्वीप में। यह द्वीप दुनिया के सबसे बडे द्वीपों में गिने जाते हैं। अन्य द्वीपों में बहुत कम लोग रहतें हैं और वे बहुत छोटे हैं। ऑकलैंड, न्यूजीलैंड का सबसे बड़ा नगर है। यह प्रायद्वीप के बहुत संकरे भाग में स्थित हैं। इस कारण दोनों तटों पर इसका अधिकार हैं परंतु उत्तम बंदरगाह पूर्वी तट पर है। आस्ट्रेलिया से अमरीका जानेवाले जहाज, विशेषकर सिडनी से वैंकूवर जानेवाले, यहाँ ठहरते हैं। यह आधुनिक बंदरगाह है। यहाँ पर विश्वविद्यालय, कलाभवन तथा एक निःशुल्क पुस्तकालय है जो सुंदर चित्रों से सजा है। जब न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में स्काई टावर पर शानदार आतिशबाजी के साथ नव वर्ष का सेलिब्रेशन शुरू हुआ तो पूरी दुनिया के हिन्दी ब्लॉगर वहाँ उपस्थित थे। 

    यह एक शानदार पल था जब हम नव वर्ष की पूर्व संध्या पर नए साल का आगाज कर रहे थेे, क्योंकि पूरी दुनिया में न्यूजीलैंड एक ऐसा देश है जहां एक दिन पूर्व ही नव वर्ष मनाया जाता है। न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया नववर्ष का सबसे पहले स्वागत करता है। न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में स्काई टावर पर लोगों की भीड़ जुटती है, जहां लेजर शो का आयोजन और आतिशबाजी होती है। स्काई टावर को इस मौके पर खास तौर पर सजाया जाता है। नए साल की शुरूआत के साथ ही स्काई टावर रोशनी से नहा उठता है। स्काई टावर से निकलती आतिशबाजियों से पूरा ऑकलैंड जगमगा उठता है। बता दें, न्यूजीलैंड के बाद नववर्ष के समारोहों का आगाज ऑस्ट्रेलिया में होता है। ऑकलैंड न्यूजीलैंड का एक ऐसा महानगर है, जहां ऑकलैंड सिविक थियेटर एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का महत्वपूर्ण विरासत तथा वायुमंडलीय रंगमंच है। इस थियेटर का निर्माण 1929 में हुआ था तथा अपनी मूल स्थिति में इसका वर्ष 2000 में पुनर्निर्माण किया गया। कोलकाता के हावड़ा ब्रिज की तरह यहाँ हार्बर ब्रिज है, जो केन्द्रीय ऑकलैंड और नॉर्थ शोर, ऑकलैंड का एक प्रतिष्ठित प्रतीक है। यहाँ का ऑकलैंड टाउन हॉल दुनिया के बेहतरीन ध्वनि संयोजन के लिए जाना जाता है। यहाँ एक ऑकलैंड युद्ध स्मारक संग्रहालय है जो ऑकलैंड डोमेन की प्रभावशाली नव-कलात्मक शैली के लिए जाना जाता है। 

    यह बड़ी बहु प्रदर्शनी संग्रहालय 1929 में बनाया गया था। इसके अलावा रैलियों और कला उत्सव की साइट एओटिया स्क्वायर, एओटिया सेंटर शहर के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। ऑकलैंड के कैथोलिक कैथेड्रल सेंट पैट्रिक कैथेड्रल, जो एक 19 वीं सदी का गोथिक इमारत है तथा करनगहपे रोड ऊपरी केंद्रीय ऑकलैंड का एक सड़क है जो बार, क्लब तथा छोटे दुकानों के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा यहाँ का केली तरल्टन सी लाइफ एक्वेरियम, न्यूजीलैंड समुद्री संग्रहालय, रानी स्ट्रीट मुख्य आकर्षण केंद्र है। इस शहर को नया आयाम देता है जो दक्षिणी गोलार्ध में सबसे बड़ा मुक्त खड़ी संरचना है, यह 328 मीटर (1,076 फुट) लंबा है और उत्कृष्ट मनोरम दृश्य के लिए जाना जाता है। 

    इसके अतिरिक्त यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में वेक्टर अरेना, पुल बेसिन, बेस्ट स्प्रिंग्स स्टेडियम, ऑकलैंड डोमेन, माउंट ईडन, माउंट विक्टोरिया तथा एक ट्री हिल है। बेहेक द्वीप जो हौराकी खड़ी में स्थित है दूसरा सबसे बड़ा द्वीप है और तटों, जंगलों, दाख की बारियां और जैतून के पेड़ों के लिए जाना जाता है। ये सभी स्थल इस महानगर को आयामीत करते हैं। न्यूजीलैंड की यात्रा के क्रम में ऑकलैंड के बाद हमारा अगला पड़ाव था हेमिल्टन होगा और इसके बाद रोटोरूया। हैमिल्टन न्यूजीलैण्ड का चौथा सबसे बड़ा नगरीय क्षेत्र है। यह उत्तर द्वीप के वाइकाटो क्षेत्र में है, ऑकलैंड से लगभग 130 किलोमीटर (80 मील) दक्षिण में। शुरुआत में यह कृषि सेवा केन्द्र था, परन्तु अब इसकी विविध और बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है और यह सम्पूर्ण न्यूजीलैण्ड में दूसरा सबसे तेजी से उन्नति करता नगरीय क्षेत्र है। शिक्षा और अनुसंधान एवं विकास हैमिल्टन की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

    यहाँ हमने विश्व प्रसिद्ध ‘वाइटोमो ग्लोवार्म गुफा‘ के माध्यम से न्यूजीलैंड के नैसर्गिक सौन्दर्य का विहंगवालोकन किया। विश्व प्रसिद्ध नाव की सवारी का आनंद लेते हुये सांस्कृतिक और प्राकृतिक इतिहास के 120 साल पुराने न्यूजीलैंड के ऐतिहासिक और भूवैज्ञानिक महत्व के इस अद्वितीय रोशनी के इस आकाशगंगा में प्रवेश करने के उपरांत हमने तुरंत एक शांत वातावरण का अनुभव किया प्रकृति के इस अनुपम दृश्य को देखकर। यहाँ के अन्य आकर्षण में हेमिल्टन गार्डेन्स, वाईकाटो संग्रहालय, वाईकाटो स्टेडियम और हेमिल्टन जू है जो हमारी यात्रा को सुखद और रोमांचक बनाने के लिए काफी था। रोटोरूआ में मनोहारी झील, जंगल और जोखिम से भरी खूबसूरत भौगोलिक परिस्थितियाँ है जहां आने के बाद स्वर्गानुभूति होती है। यहाँ की सबसे पुरानी मओरी संस्कृति की झलक देखने को मिली। रोटोरुआ दोनों घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए एक प्रमुख गंतव्य है। यह अपने भूतापीय गतिविधि के लिए जाना जाता है। यह वनस्पति उद्यान और ऐतिहासिक वास्तुकला के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 

    न्यूजीलैंड एक छोटा सा देश है जो मुख्यतः उत्तरी व दक्षिणी, दो द्वीपों का समूह है। सर्फिंग, जेट बोटिंग, बेलूनिंग, स्काई डाइविंग, ग्लाइडिंग के लिए यह देश खास तौर पर मशहूर है। बेहतरीन सुव्यवस्थित गार्डन, चिडियाघर, कैसिनों इस देश के कुछ अन्य ऐसे आकर्षण हैं जिनमें कोई भी सैलानी चाहकर भी स्वयं को अछूता नहीं रख पाता। हम जिन-जिन क्षेत्रों से गुजरे उसमें से एक है माउंट ताराबेस। उत्तरी द्वीप पर स्थित यह पवित्र ज्वालामुखी माओरी जनजाति की संपत्ति मानी जाती है। इसके मुख का भाग अब पानी भर जाने के बाद रोतो माहाना झील के नाम से जाना जाता है। अतीत में कभी सक्रिय रहा यह ज्वालामुखी आज भी रोमांच का अनुभव कराता है। दूसरा है तोंगारिरो राष्ट्रीय उद्यान। यह जगह विश्व विरासत के रूप में विख्यात है। उत्तरी द्वीप पर स्थित यह उद्यान अपने नाटकीय व अद्भुत दृश्यों के लिए जाना जाता है। 

    हरे घास के मेदान से गुजरते हुए कब हम पर्वत चोटियों के करीब पहुंच गए यह पता ही नहीं चला। कहते हैं न्यूजीलैंड में सैर का सर्वोत्तम समय सितंबर से अप्रैल के बीच का है। इस वक्त यहां मौसम साल भर की तुलना में अपेक्षाकृत गर्म रहता है। दिसंबर का द्वितीय पक्ष पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत बेहतर होता है। 23 दिसंबर 2016 से 1 जनवरी 2017 के बीच न्यूजीलैंड की आर्थिक राजधानी ऑकलैंड में आयोजित ‘सप्तम अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन‘ में जाने वाले प्रतिभागी न्यूजीलैंड के महत्वपूर्ण मौसम का भरपूर लुत्फ लिया। आड़ी-तिरछी लकीरों की तरह नीला समुंदर हिमाच्छादित पहाड़ियों को चीरते हुए धरती पर अपना रास्ता बनाता हुआ न्यूजीलैंड एक अदभुत देश है। यह देश प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य का एक जीवंत परिक्षेत्र है। ऊँची नीची पहाड़ियों पर हरी भरी घास पर चरती भेड़ों, गायों और हिरणों को देख कर हृदय प्रफुल्लित हो उठता है। 

    समुद्र -तट पर छोटी छोटी अनेकानेक निजी नावें लहरों पर थिरकती हुई बहुत सुंदर प्रतीत होती हैं। भोजन के बाद मनमोहक प्रकृति का लुत्फ उठाते हुए हाड़ियों पर घूमना अपने आप में अलौकिक है। समंदर इतना गहरा नीला है जितना हमने कहीं नहीं देखा। पानी भी कुछ ज्यादा ही ठंडा और खारा मिला यहाँ। सप्तम अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का उदघाटन सत्र जहां आयोजित हो रहा था, उस शहर की विशेषताएँ जानकार हम हतप्रभ रह गए। जी हाँ बात कर रहा हूँ ऑकलैंड की। शीतल मंद हवा के झोंके से लहराते जहाज के पाल और हवा से बातें करती हुयी सर्ू्य की किरणें जब आड़ी-तिरछी लकीरों की तरह नीला समुंदर हिमाच्छादित पहाड़ियों को चीरती हुयी धरती पर अपना रास्ता बनाए तो सोचिए यह दृश्य मन को कितना रोमांचित करेगा? यही है इस शहर का नैसर्गिक सौंदर्य जो विश्व के किसी अन्य शहर में देखने को नहीं मिलता। यह शहर ‘सिटी ऑफ सेल्स’ के नाम से मशहूर है।
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    बिना पंख के शिखर छूती प्रतिभाएं

  • by
  • संजीव शर्मा
  • प्रतिभाएं कभी सुविधाओं की मोहताज नहीं होती बल्कि वे अवसरों का इंतज़ार करती हैं ताकि वक्त की कसौटी पर स्वयं को कस सकें. असम बोर्ड की इस बार की परीक्षाओं में कई ऐसे मेधावी छात्रों ने अपने परिश्रम का लोहा मनवाया है जिनके घर में पढाई का खर्च निकालना तो दूर, दो वक्त के खाने के भी लाले पड़े रहते हैं. 

    सिलचर के राज सरकार के पास रंग और ब्रश खरीदने के पैसे नहीं हैं फिर भी उसने फाइन आर्ट्स में पूरे राज्य में अव्वल स्थान हासिल किया है. राज को 100 में से 100 अंक मिले हैं. आलम यह है कि उसके स्कूल में इस विषय को पढ़ाने-सिखाने वाले शिक्षक तक नहीं है और उसके माता-पिता भी दैनिक मजदूर हैं इसलिए घर में इस कला को समझने वाला कोई नहीं है लेकिन एकलव्य की तरह साधना करते हुए राज ने अपने परिश्रम से ऐसा मुकाम हासिल कर लिया है अब राज्य सरकार से लेकर कई स्थानीय संस्थाएं भी उसकी मदद को आगे आ रही हैं.

    राजदीप दास की कहानी तो और भी पीड़ादायक है. बचपन से ही पोलियो के कारण वह चल फिर नहीं सकता था लेकिन पढाई के प्रति लगन देखकर उसके पिता प्रतिदिन गोद में लेकर स्कूल आते थे. ऐन परीक्षा के पहले उसके दाहिने हाथ ने भी काम करना बंद कर दिया. रिक्शा चालक पिता की हैसियत इतनी नहीं थी कि तुरंत इलाज करा सकें. तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी राजदीप ने पढाई नहीं छोड़ी और उसने बोर्ड परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर परिवार और स्कूल का नाम रोशन कर दिया. अनपढ़ माता पिता के लिए तो अपने दिव्यांग बेटे की यह सफलता मेरिट लिस्ट में पहला स्थान पाने जैसी है. अब राजदीप प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए बड़ा अधिकारी बनकर न केवल अपने परिवार के आर्थिक संकट को दूर करना चाहता है बल्कि अन्य बच्चों के लिए भी आदर्श बनना चाहता है.  

    मजदूर परिवार की दायिता पुष्पा की कहानी तो और भी अनूठी है. असम बोर्ड के 12वीं के नतीजों में उसे फेल दिखाया गया था। छात्रा और उसके स्कूल ने जब बोर्ड से इस संबंध में बात की तो पता चला कि वह फेल नहीं, बल्कि उसने टॉप टेन में शामिल है।

    दरअसल बोर्ड की गफलत के चलते दायिता को एक विषय में अनुपस्थित मानकर फेल कर दिया गया । जांच में पता चला कि छात्रा अनुपस्थित नहीं थी बल्कि गलती से उसके अंक जुड़ नहीं पाए थे। बोर्ड ने अपनी गलती मानते हुए तत्काल ही उसका संशोधित रिजल्ट घोषित करते हुए बताया कि दायिता पुष्पा ने टॉप टेन में सातवां स्थान हासिल किया है। उसे कुल 500 में 471 अंक मिले हैं।


    लिंटन नामसुद्र, अमन कुर्मी,विक्रम सूत्रधार जैसे कई नाम हैं जिन्होंने इस वर्ष गरीबी, स्कूल से दूरी, संसाधनों का अभाव जैसी तमाम प्रतिकूल स्थितियों में भी अपनी मेहनत से साबित कर दिया है कि यदि किसी भी काम को करने की लगन और उत्साह हो तो सफलता की राह कोई नहीं रोक सकता.   
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    लोक मेधा के कलमकारः रवीन्द्र प्रभात

  • by
  • नुक्‍कड़

  • () डॉ. रामबहादुर मिश्र 

    विगत पाँच छः वर्षों में साहित्यकार रवीन्द्र प्रभात की छवि साहित्य जगत में एक ब्लॉगर, ब्लॉग विश्लेषक एवं लगभग आठ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन के संयोजक के रूप में स्थापित हो गयी है जबकि उन्होने साहित्य की अनेकानेक विधाओं में प्रभावी लेखन किया है। एक सहृदय कवि, लोक कथाकार, कुशल निबंधकार, सफल संपादक और सार्थक संगठनकर्ता भाई रवीन्द्र प्रभात के बारे में लिखते समय तय नहीं कर पाता कि उनकी किस सृजनधर्मिता को उत्कृष्ट या उल्लेखनीय कहूँ-‘को बड़ छोट कहत अपराधू'। यह किसी भी कलमकार की प्रतिभा का कमाल है कि जिस विषय पर भी कलम चलाया पाठकों की बाहबाही मिली। ऐसा प्रभात जी के साथ है। उन्होने गजल संग्रह ‘मत रोना रमजानी चाचा‘, गीत-गजल संग्रह ‘हम सफर‘, कविता संग्रह ‘स्मृति शेष‘, उपन्यास ‘प्रेम न हाट बिकाय‘ और ‘ताकि बचा रहे लोकतन्त्र‘ समीक्षात्मक पुस्तक ‘हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास‘, हिन्दी मासिक ‘परिकल्पना समय‘ और संपादित पुस्तक ‘समकालीन नेपाली साहित्य‘ और सह संपादित ‘हिन्दी ब्लॉगिंगः अभिव्यक्ति की नई क्रान्ति‘ के माध्यम से साहित्य जगत को अपनी बहुमुखी प्रतिभा से परिचित कराया है। उनका सर्वाधिक चर्चित व्यंग्य धारावाहिक ‘धरती पकड़ निर्दलीय‘ बहुचर्चित रहा जिसे वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज ने प्रयोगधर्मी उपन्यास की संज्ञा दी है। 

    रवीन्द्र प्रभात के लेखन की विशेषता है कि वे जिस जीवन और समाज से अनुभव बटोरते हैं उससे अगाध प्रेम भी करते हैं। वे उस परिवेश का चित्रण ही नहीं करते अपितु उसे जीते भी हैं। सीतामढ़ी बिहार जहां उनका जीवन बीता उसे छोड़े हुये एक युग बीत गया किन्तु आज भी उनके मन में रचा-बसा है उनका गाँव, वहाँ की संस्कृति, वहाँ के सुख-दुःख। धरती पकड़ निर्दलीय (उपन्यास) का बढ़ाईपुरवा गाँव प्रकारांतर से उनका गाँव है-गाँव की समृद्धि की कामना, विवशता, अभाव, अशिक्षा, रूढ़ियाँ, संस्कृति प्रेम, संस्कृति में निहित प्रतिरोध क्षमता, राजनीति का पतन, राष्ट्रीय सुरक्षा, दलाली-ठेकेदारी, भ्रष्ट नौकरशाही, वोट का व्यापार, स्वार्थपरता, अमरीकी दादागिरी, पाँच परमेश्वर बनाम प्रपंच परमेश्वर, जनता की संपत्ति का बंदरबान्त, दिल्ली का बिचित्र चरित्र, पारस्परिक विद्वेष, गाँव में बढ़ता असंतोष, अनाचार, अन्याय, अपराध, भ्रष्ट पुलिस, मंहगाई, कठिन जीवन यापन, सरकारी तंत्र, जन प्रतिनिधियों के कारनामे, गाँव में आते नए परिवर्तन, गांवो का शहरीकरण, गांवो में पहुँचती संचार क्रान्ति, वैश्वीकरण-बाजारीकरण, राजनैतिक भ्रष्टाचार और सबकुछ होने के बावजूद जीता जागता गाँव। यह सब व्यक्त करना कठिन होता यदि रवीन्द्र प्रभात के पास भोगा हुआ यथार्थ न होता। 

    गाँव की जनता संचार क्रान्ति में वह सबकुछ जानती है, प्रादेशिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सभी मुद्दों पर वह स्वस्थ बहस करती है। धरती पकड़ निर्दलीय का एक प्रसंग दृष्टव्य है- ‘‘ई त बड़ी दूर की बात कहत हौ निर्दलीय जी। नेतवन हो या ब्यूरोक्रेसी या फिर नककटवा सबका चरित्र हो गया है हमारे देश मा तवायफ के गजरा जइसा। रात को पहनो सुबह को उतार दो। सब ससुरा समझ लिया है ई देश को रामजी की चिरई रामजी का खेत।‘‘ लोकतन्त्र की ताकत का अहसास है हर आदमी को - ‘‘ई जो पब्लिक है राम भरोसे सब जानत है। सभके पहचानत है। चाहे महामाया हो चाहे सोनिया चाची। आज तक केहू पब्लिक के वार से कबौ बचल चाची? नोएडा से लखनऊ तक बहिन जी खाके खिलाके सोशल इंजीनियरिंग के हाथी दाँत के पाठ जनता के पढ़ौली सब धन बाईस पसेरी वाला हिसाब तोता नियन रटौली। मगर एन मौके पर सब गुड गोबर हो गइल। चुनाव आयोग मतदान खातिर महिना गलत चुन लिहले। फागुन मा वोट डाले से ससुरा सब गड़बड़ हो गइल। भंग के तरंग में उड़ गइल धज्जी सोशल इंजीनियरिंग के आ गइल प्रदेश मा अखिलेश का नया साम्राज्य।‘‘ 

    कुल मिलाकर देखा जाये तो रवीन्द्र जी लोकभाषा की ताकत को भलीभाँति समझते हैं और उसका सटीक प्रयोग भी करते हैं। 

     अध्यक्षः अवध भारती संस्थान, लोकसदन, नरौली, हैदरगढ़, बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)
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    जलीकट्टू और सिर पर उगे नुकीले सींग

  • by
  • Nirmal Gupta
  • अढाई हज़ार साल से हम जलीकट्टू खेलते हुए मरखने बैलों को साध रहे हैं।सैकड़ों बरसों से हम एक दूसरे के कंधे पर पाँव रख कर दही की हांडी चकनाचूर कर रहे हैं।गत अनेक  दशकों से हम अपने बच्चों को भविष्य  के लिए प्रशिक्षित करने के नाम पर तोते जैसी रटंत विद्या में प्रवीण बना रहे हैं।वर्तमान में हम अतीत के  चोटिल परन्तु महिमामंडित संस्कृति  में संतति के लिए गोलमटोल ‘पे पैकेज’ टटोल रहे हैं।बदलते वक्त के साथ हम खुद को लेशमात्र बदलने को तैयार नहीं।गंदगी से बजबजाती नालियों को हम इसलिए साफ़ करने को तैयार नहीं क्योंकि स्वच्छता से हमारी युगीन असहमति रही है।जीवन मूल्य तेजी से उल्ट पलट हो रहे हैं लेकिन हम अपनी परम्पराओं के वैभव के समर्थन में  डटे  हैं।हमारे सिरों पर  नुकीले सींग उग आये हैं।
    बैल के सींग पर लटके सोने चांदी के सिक्के पाने या लूटने पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। लूटपाट ही हमारी महत्वकांक्षा है।आकाश में लटकी हांडियों  को फोड़ कर उसमें रखे द्रव्य को पाने की वीरता  सर्वकालिक है। लेकिन इसमें  जोखिम  है।सबको पता है कि नो रिस्क ,नो गेम।जिस काम में रिस्क फैक्टर न हो वह तो घर की चौखट पर बैठकर लडकियों द्वारा खेले जाने वाले गिट्टू का खेल है।बेहद निरापद।अतिशय मासूम।एकदम घरेलू।निहायत स्त्रैण।
    एक समय था जब लड़के गली मोहल्ले में गुल्ली डंडा खेलते थे ।लडकियाँ घर आंगन में इक्क्ल दुक्कल खेलती थीं।लड़के उद्दंड होते हैं।तब भी होते होंगे।खेल ही खेल में झगड़ पड़ते।परस्पर मारपीट कर बैठते।लडकियाँ सहेलियों से किसी बात पर नाराज होती हैं,तो रूठ जाती।मुंह फुला लेती।अबोला कर लेती।ऐसा करते करते कब ये खेल समय बाहर हुए,पता ही नहीं लगा।न कोई सवाल उठा।न किसी ने इन खेलों के खत्म होने को लेकर गुस्सा जताया।
    जलीकट्टू पर लगे बैन को लेकर सांस्कृतिक विरासत के हलवाहे ऐसे  बैचैन थे  जैसे कोई ऐतिहासिक साहस का क्या बनेगा।
    कोई भी न्याय पद्धति बैल या दही हांडी से बड़ी  कैसे हो सकती  है?
    @निर्मल गुप्त



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    भारतीय ब्लॉगरों और साहित्यकारों ने न्यूजीलैंड में फहराई हिन्दी की पताका

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  • ravindra prabhat

  • ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) .विगत 23 दिसंबर 2016 से 01 जनवरी 2017 के बीच न्यूजीलैंड के ऑकलैंड, हेमिल्टन, रोटोरूआ आदि शहरों में आयोजित सातवें अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मेलन में फिजी के शिक्षा मंत्रालय के हिन्दी प्रतिनिधि श्री रमेश चन्द्र, बिहार विधानसभा के अध्यक्ष श्री विजय कुमार चौधरी, न्यूजीलैंड नेशनल पार्टी की सांसद डॉ परमजीत परमार तथा हिन्द मेडिकल कॉलेज लखनऊ के निदेशक डॉ ओ. पी. सिंह की गरिमामयी उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। 

    सभा का प्रारंभ कोरियन ड्रमबीट के द्वारा बड़े ही सकारात्मक रूप से हुआ। इस अवसर पर बिहार विधानसभा के अध्यक्ष श्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि आज जहां पूरा विश्व विकास और प्रगति की अंधी दौड़ में इस कदर भाग रही है कि मनुष्य का आंतरिक और भावनात्मक पहलू गौण होता जा रहा है। ऐसे में लखनऊ के एक ब्लॉगर रवीन्द्र प्रभात के द्वारा अपनों को अपनों के साथ मिलन कराने तथा भारतीय महाद्वीप की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को पूरी दुनिया में फैलाने की दिशा में कार्य करना गर्व महसूस कराता है। परिकल्पना को मेरी शुभकामनायें और भारतीय ब्लॉगरों को बहुत-बहुत बधाइयाँ। न्यूजीलैंड की सत्ताधारी नेशनल पार्टी की सांसद श्रीमती परमजीत परमार ने कहा कि मुझे बहुत खुशी हो रही है अपने भारतवासियों को न्यूजीलैंड की धरती पर अपने मध्य पाकर। मैं अभिभूत हूँ कि हमारे भारतवासी पूरी दुनिया में घूम घूमकर ब्लॉगिंग के माध्यम से हिन्दी और भारतीय भाषाओं को प्रमोट कर कर रहे हैं। यह परंपरा बनाए रखने की जरूरत है। 

    उन्होने अपने भाषण में आगे कहा कि भारत और हिंदी भाषा से उनका विशेष लगाव रहा है, मुझे बहुत ख़ुशी है कि इस न्यूजीलैंड के जमीन पर भी भारतवासी अपनी मातृभाषा हिंदी का प्रचार- प्रसार और लेखन कार्य बड़े ही सफलतापूर्वक कर रहें हैं। वहीं फिजी से आये श्री रमेश चंद ने फिजी में होने वाले हिंदी सम्मेलन में सबको आमंत्रित किया। इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक श्री रवीन्द्र प्रभात ने कहा कि पुस्तकों और समाचारपत्रों में लेखन कार्य की अपनी सीमाएं होती है लेकिन ब्लॉगर के माध्यम से लेखक शुद्ध रूप से अपनी बात पाठकों तक पहुँचा सकता है, उसमें किसी प्रकार का बनावटीपन नहीं होता। इसके अतिरिक्त इस अवसर पर श्रीमती कुसुम वर्मा की मिश्रित कला प्रदर्शिनी भी आयोजित की गई, जिसमें ग्रामीण कला और भारतीय परंपरा का बड़ा ही मनोरम चित्र प्रस्तुत किया गया। 

    उसके पश्चात् इस अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का भी आयोजन हुआ, जिसमें भारत, न्यूजीलैंड, ओस्ट्रेलिया तथा फ़िजी के कवियों ने हिस्सा लिया। कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से सभा को मंत्र मुग्ध किया। इस अवसर पर हैदराबाद की कवयित्री और ब्लॉगर श्रीमती सम्पत देवी मुरारका तथा रायपुर छतीसगढ़ की कथाकार और ब्लॉगर डॉ उर्मिला शुक्ल को क्रमश: डॉ अमर कुमार स्मृति परिकल्पना सम्मान तथा अविनाश वाचस्पति स्मृति परिकल्पना सम्मान से अलंकृत और विभूषित किया गया। इस विशेष सम्मान के अंतर्गत उन्हें स्मृति चिन्ह, अंगवस्त्र और 11 हजार रुपये की धनराशि प्रदान की गयी। 

    25 दिसंबर 2016 को ऑकलैंड के हेंडरसन में स्थित केलस्टन कम्यूनिटी हॉल न्यूजीलैंड में आयोजित सातवें अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में श्रीमती मुरारका के अतिरिक्त भारत के विभिन्न हिस्सों से आए मसलन संस्कार टीवी, दिल्ली के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर रवि कान्त मित्तल, आजतक और इंडिया टुडे की समाचार संपादक सीमा गुप्ता, कबीर कम्यूनिकेशन की क्रिएटिव हेड सर्जना शर्मा, रेवान्त पत्रिका की संपादक डॉ अनीता श्रीवास्तव, लोक गायिका कुसुम वर्मा, उद्घोषिका श्रीमती रत्ना श्रीवास्तव, कथाकार डॉ अर्चना श्रीवास्तव, कवयित्री डॉ निर्मला सिंह निर्मल, पुरातत्वविद डॉ रमाकांत कुशवाहा ‘कुशाग्र‘, शिक्षाविद डॉ विजय प्रताप श्रीवास्तव आदि भी सम्मानित किए गए। 

    इस अवसर पर भारतीय सभ्यता-संस्कृति को आयामित करती लोक कला प्रदर्शनी, नृत्य, गीत के साथ-साथ परिकल्पना की स्मारिका, डॉ अर्चना श्रीवास्तव की सद्य प्रकाशित कृति थाती, डॉ निर्मला सिंह निर्मल की यह व्यंग्य नहीं हकीकत है और श्रीमती सम्पत देवी मुरारका की व्यंग्य यात्रा तृतीय का लोकार्पण भी संपन्न हुआ। परिचर्चा सत्र के दौरान अपने उद्वोधन के क्रम में ब्लॉग के माध्यम से वैश्विक स्तर पर शांति-सद्भावना की तलाश विषय पर बोलते हुये श्री रवीकान्त मित्तल ने कहा कि यही एक माध्यम है जो पूरी तरह वैश्विक है। आपके विचार चंद मिनटो में पूरी तरह वैश्विक हो जाती है और उस पर प्रतिक्रियाएँ भी आनी शुरू हो जाती है। यदि ब्लॉगर चाहे तो अपने सुदृढ़ विचारों के बल पर पूरी दुनिया में शांति-सद्भावना को स्थापित कर सकता है। आज जरूरत इसी बात की है। इस परिचर्चा में लगभग आधा दर्जन ब्लॉगरों ने हिस्सा लिया। 

     नव वर्ष से पूर्व यानी 30 दिसंबर 2016 को  भारतीय समुदाय द्वारा आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में न्यूजीलैंड के वरिष्ठ सांसद श्री कंवलजीत सिंह बख्शी ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रमों से विभिन्न देशों तथा समुदायों के बीच संस्कृतियों का आदान प्रदान होता है। आप सभी का हम न्यूजीलैंड की इस खूबसूरत भूमि पर स्वागत करते हैं। इस अवसर पर अवधि की प्रसिद्ध लोकगायिका कुसुम वर्मा द्वारा लोकगायन और नृत्य भी प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का संचालन लखनऊ की श्रीमती रत्ना श्रीवास्तव ने किया।
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    डॉ उर्मिला शुक्ल को अविनाश वाचस्पति स्मृति परिकल्पना दशक सम्मान

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  • ravindra prabhat

  • जैसा कि आप सभी को विदित है कि विगत दस वर्षों मे परिकल्पना परिवार ने अपने दो महत्वपूर्ण साथियों को खोया है। एक डॉ अमर कुमार और दूसरे अविनाश वाचस्पति । इन दोनों शख़्सियतों का जाना किसी करिश्मे का ख़त्म होने जैसा रहा है। उन दोनों विभूतियों के अचानक अलविदा कह देने से केवल हिन्दी ब्लॉगिंग को ही नहीं बल्कि इंसानियत को बहुत बड़ा नुकसान हुआ । डॉ अमर कुमार ने जहां अपनी चुटीली टिप्पणियों से ब्लॉग पर नए-नए मुहबरे गढ़कर अपनी स्वतंत्र छवि विकसित की थी वहीं अविनाश वाचस्पति ने ब्लॉग पर नए-नए प्रयोगों को प्रतिष्ठापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
    परिकल्पना द्वारा इन दोनों विभूतियों की स्मृति में ग्यारह हजार रुपये के दो पुरस्कार क्रमश"अमर कुमार स्मृति परिकल्पना दशक  सम्मान" हैदराबाद, तेलांगना से सम्पत देवी मुरारका को तथा "अविनाश वाचस्पति  स्मृति परिकल्पना दशक सम्मान" रायपुर, छतीसगढ़ की डॉ. उर्मिला शुक्ल को देने का निर्णय लिया गया है। आज उसकी सूची निर्णायकों ने सौंप दी है। दोनों महत्वपूर्ण सम्मान महिला ब्लॉगर के हिस्से में गया है, जिन्हें आगामी क्रमश: 25 दिसंबर 2016 को न्यूजीलैंड की आर्थिक राजधानी ऑकलैंड और 31 दिसंबर 2016 को न्यूजीलैंड की सांस्कृतिक राजधानी वेलिंगटन में सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त होगा। एक ब्लॉगर उत्तर भारत से और एक दक्षिण भारत से हैं।
    हिंदी में यात्रा वृतांत की सुपरिचित हस्ताक्षर हैदराबाद (तेलंगाना) निवासी श्रीमती सम्पत देवी मुरारका, जिन्होने 2011 में बहुवचन नामक ब्लॉग प्रारम्भ किया जिसमें नेपाल, थाईलैंड, हांगकांग, सिंगापुर, लन्दन, बेल्जियम, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, इटली, फ्रांस, न्यूयॉर्क, न्यूजर्सी, बफलो, फिलाडेल्फिया, वाशिंगटन डी.सी., वर्जीनीया, लॉस एन्जलस, लॉस वेगास, नेवेडा ग्रेंड केनन, सोलावेंग, हर्ष कैशल, सेन फ्रांसिस्, बर्सटोव, थौस्मिट नैशनल पार्क, लन्दन ब्रीज, सेंडीगो, 9सी वर्ल्ड), बाल्टीमोर, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन दुबई,आबूधाबी और युएई आदि देशों की यात्रा कर उन्होने वहाँ के सुखद संस्मरणों को अंकित करते हुये सृजन को नया आयाम देने की कोशिश की। वे एकसाथ कई विधाओं में सार्थक हस्तक्षेप रखती हैं। उन्हें 15 से 18 जनवरी 2015 के दौरान भूटान में आयोजित चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान से अलंकृत और विभूषित किया गया था। इसके अलावा वे पूर्व में भारतीय संस्कृति निर्माण परिषद्, हैदराबाद का महारानी झांसी पुरस्कार, भारतीय वांगमय पीठ, कोलकाता का सारस्वत सम्मान, जैमनी अकादमी पानीपत, हरियाणा का रामधारी सिंह दिनकर सम्मान, भारतीय संस्कृति निर्माण परिषद्, हैदराबाद का जन जागृति सद्भावना पुरस्कार, तमिलनाडू हिंदी साहित्य अकादमी, चेन्नई का साहित्य सेवी सम्मान आदि से अलंकृत और समादृत हो चुकी है।

     हिंदी कहानी और कविता की सुपरिचित हस्ताक्षर रायपुर (छतीसगढ़) निवासी डॉ उर्मिला शुक्ल ने 2011 में मनस्वी नामक ब्लॉग प्रारम्भ किया जिसमें स्त्री शक्ति और लोकरंग को उन्होने प्रमुखता के साथ उठाते हुये सृजन को नया आयाम देने की कोशिश की। वे एकसाथ कई विधाओं यथा कहानी ,कविता , समीक्षा , शोध पत्र , यात्रा संसमरण आदि पर सार्थक हस्तक्षेप रखती हैं। उनकी पुस्तक ‘हिंदी अपने अपने मोर्चे पर‘ म. प्र. साहित्य परिषद द्वारा 1995 में पाण्डुलिपि प्रकाशन योजना के तहत पुरष्कृत एवं प्रकाशित हुयी है। उनकी प्रकाशित कृतियों में हिंदी अपने अपने मोर्चे पर, फूलमती तुम जागती रहना आदि प्रमुख है। उन्हें विगत 25 मई 2015 को कोलंबो (श्रीलंका) में आयोजित पंचम अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में परिकल्पना सार्क सम्मान से अलंकृत और विभूषित किया गया था। अभी हाल ही में कलमकार फाउंडेशन नई दिल्ली की ओर से आयोजित अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में उनकी कहानी ‘सलफी का पेड़ नहीं औरत‘ को पुरस्कार के लिए चुना गया था। छत्तीसगढ़ से चुनी जाने वाली ये एकमात्र कहानी है। बस्तर पर आधारित ये कहानी-कहानी जगत में छत्तीसगढ़ को रेखांकित करती है।
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    सुर्खियाँ

    जी हां दुनिया गोल घूमती है

     
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